मरु पर मांगू नहीं, अपने तन के काज।
परमारथ के कारने, मोहे न आवे लाज।।
संत कबीर दास जी, एक महान रहस्यवादी एवं निर्गुण काव्यधारा के
कवि के अनुसार, अपने लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाना मरने के
समान है, किंतु यदि बात दूसरों के हित की हो, तो व्यक्ति को सौ बार
भी हाथ फैलाने पड़ जाए, तब भी पीछे नहीं हटना चाहिए और ऐसा व्यक्ति
ही पुण्य का भागी बनता है।
मंदिर निर्माण हेतु श्रद्धा भाव रखने वाले सभी भक्तों गणों से निवेदन है
तन मन धन जिस प्रकार यथा शक्ति आप आगे बढ़कर सहयोग करें और
प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करें।